चप,चाप,चपराना राजवंश
गुर्जरों में 'चपराणा" गोत्र है जो चाप राजवंश के ही वंशज ,ये घोड़े पर खडे होकर, पीछे मुडकर, एक हाथ से या कहें कि हर प्रकार से तीर चलाने में सक्षम थे। गुर्जरों का चपराणा गोत्र, गुर्जरों के ही सैनिकों मेें बडा हिस्सा तीरंदाजों का था गुर्जरों को दुनिया का सबसे अच्छा घुड़सवार और धनुर्धर माना जाता था।
चापो को संस्कृत के शब्द ‘चापोतकट” के नाम से जाना जाता है।चाप शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ “धनुष’ होता है।हूणों का वो हिस्सा जो धनुष के साथ जंग किया करता था उसे भारतीय राजाओ द्वारा चापोतकट कहा गया।उन धनुषधारी सैनिको ने बाद मे एक भारत का महान राजवंश खड़ा किया जिसे चाप राजवंश कहा गया। गुर्जरो मे ‘चपराणा” गोत्र है जो चाप राजवंश के ही वंशज है चपराणा का अर्थ चाप(धनुष)+राणा(राजा)=धनुषधारी राजा निकलता है।इनके चलाए बाण अचूक कहे जाते और अपनी तीरअंदाजी के लिए पूरे विश्व मे मशूहर थे। गुर्जरो का चपराणा गोत्र “हूण’ गुर्जरो की ही एक शाखा है।ध्यान देने वाली एक ये बात है की हूणो के सैनिको मे बडा हिस्सा तिरंदाजो का था जो चाप के हूण से सम्बन्ध को गहरा करता है।
हूणों को समकालीन दुनिया का सबसे अच्छा घुड़सवार और धनुर्धर माना जाता था। सातवीं शताब्दी में भीनमाल से गुर्जरदेश (आधुनिक राजस्थान) पर शासन करने वाले राजा व्याघ्रमुख गुर्जर “चाप वंश” के थे। उसका सिक्का हुणो के सिक्कों की नकल है, इसलिए इसे वी.ए. स्मिथ द्वारा ‘राजा व्याघ्रमुख चपराणा’ के हुण सिक्के के रूप में कहा गया। मध्यप्रदेश के चंबल संभाग में चपराणा और हुण गुर्जर पाग-पटल भाई के रूप में जाने जाते हैं। वनराज चावड़ा, जिन्होंने अनिलवाड़ा शहर की स्थापना की थी, पंवार और पंवार हुण मूल के गुजराती थे, इस प्रकार चाप, चपराना, चावड़ा, चपोटक, छावडा, छावडी भी हुण मूल के हैं 🙏🏻 आपका सेवक- निशांत खटाना🙏🏻
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