ऋषि और राजा कर्ण गुर्जर (गुर्जरकर्ण)

ऋषि और राजा कर्ण गुर्जर (गुर्जरकर्ण)

 गुर्जरगोड़ ब्राह्मणों की उत्पति गौतम ऋषि के पुत्रों से बताई गई है । गोड़वान प्रदेश के निवासी होने और राजा कर्ण गुर्जर तथा गुर्जर प्रदेश के कारण उन्हें गुर्जरगोड़ कहा जाने लगा, गुर्जर प्रदेश की राजधानी पुष्कर थीं। राजा कर्ण गुर्जर गौतम ऋषि को पुत्र प्राप्ति यज्ञ के लिए गुर्जर प्रदेश आने के लिए आमंत्रित करते है ।


गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य और गुर्जरात्रा :

राजस्थान के दक्षिण पश्चिम में गुर्जरात्रा प्रदेश में प्रतिहार वंश की स्थापना हुई। ये अपनी उत्पति लक्ष्मण से मानते है। लक्षमण राम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे व अरबो से अपने देश की रक्षा 1 प्रतिहार (द्वारपाल) की भांति करने पर भी यह गुर्जर वंश प्रतिहार कहलाया। 

गुर्जरों की शाखा से संबंधित होने के कारण इतिहास में गुर्जर (प्रतिहार उपाधि के कारण) गुर्जरप्रतिहार कहलाये।  बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशियन द्वितीय के एहोल अभिलेख में गुर्जर जाति का उल्लेख आभिलेखिक रूप से सर्वप्रथम रूप से हुआ है। 

प्रसिद्ध इतिहासकार रमेश चन्द्र मजूमदार के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों ने छठी सदी से बारहवीं सदी तक अरब आक्रमणकारियों के लिए बाधक का काम किया और भारत के द्वारपाल(प्रतिहार) की भूमिका निभाई।

नीलकुण्ड, राधनपुर, देवली तथा करडाह शिलालेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।  अरब यात्रियों ने इन्हे ‘जुर्ज’ लिखा है। अलमसूदी गुर्जर प्रतिहार को ‘अल गुजर’ और राजा को बोहरा कहकर पुकारता है जो शायद आदिवराह का विशुद्ध उच्चारण है। 

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