गुजरात में मूल गुर्जर

रेबाडी ही हैं गुजरात के मूल गुर्जर...
दोस्तों आज एक अहम विषय पर लिख रहा हूँ जिसके बारे में अधिकतर गुर्जर समुदाय खुद ही अनभिज्ञ है. गुर्जरों के स्वर्णिम काल (गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य 600 AD-800 AD) के दौरान गुर्जर एक विशालकाय समुदाय था जो बाद के संघर्षो और विपरीत परिस्थितियों के कारण हमेशा विघटित होता गया. बाहरी कारको के साथ साथ खुद गुर्जर समुदाय में सामंती मानसिकता के तत्त्व भी इसके लिए उतने ही जिम्मेदार रहे हैं. 
आज अमूमन हर गुर्जर के दिमाग में एक सवाल आता है कि आज का गुजरात राज्य जिसका इतिहास सोलंकी गुर्जरों की वीरगाथाओ से भरा पड़ा है और जिसको 'गुजरात' नाम खुद गुर्जरात्रा (गूजरी भाषा में गुजरात्ता) गुर्जरों ने दिया वंहा आज गुर्जरों की जनसँख्या नगण्य क्यों है? सच यह है की रंग बिरंगी संस्कृति वाले रेबारी समुदाय के रूप में आज भी गुर्जर भारी संख्या में गुजरात में आबाद हैं. थोडा आगे बढें उससे पहले बता दें की रेबारी कैसे गुर्जरों से अलग थलग पड़ गए. गुर्जर प्रतिहार काल में राजपूत नाम की कोई जाति नहीं थी बल्कि गुर्जर समुदाय में खुद ही व्यवसाय के आधार पर कई वर्ग थे जैसे शासक वर्ग(राजा, सामंत, राज्याधिकारी, मंत्री इत्यादि), सैनिक वर्ग, कृषक(खेतिहर गुर्जर), पशुपालक इत्यादि. इनमे जनसँख्या के आधार पर पशुपालक वर्ग सबसे बड़ा था. ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं की मध्येशिया से आये गुर्जर समुदाय को उस समय पश्चिम एशिया व यूरोप की अन्य लड़ाकू जातियों की तरह पशुओ( घोडा, ऊँट, गाय आदि) का बहुत शौक था अतः व्यवसाय के तौर पर अधिकतर गुर्जर पशुपालन करते थे. इसी पशुपालक वर्ग में रेवड़ (भेड़, बकरिया, ऊँट) पालने वाले गुर्जरों को उस समय रेबाडी गुर्जर कहा जाता था जो बाद में अलग थलग पड़कर सिर्फ रेबाडी रह गए. यही रेबाडी गुर्जर भारी संख्या मे गुजरात से जम्मू कश्मीर भी गए थे जो आज वह बकरवाल कहलाते हैं. रेबाडी और बकरवाल गुर्जरों की वेशभूषा व आभूषण अभी भी एक तरह के हैं दोनों में काला रंग बेहद प्रिय है.

गुजरात में गुर्जरों का पहला विघटन तब हुआ जब मुगलों के आगमन के बाद एक नया वर्ग राजपूत बना (प्रारंभ में राजपूत केवल एक वर्ग था ना कि जाति) तो गुजरात व राजस्थान में गुर्जरों के उच्च वर्ग ने ज्यादातर खुद को राजपूत कहना शुरू कर दिया था. दूसरा विघटन तब हुआ जब विदेशी सत्ता की स्थापना के बाद गुर्जर समुदाय ने भारी संख्या में गुजरात से उत्तर की और पलायन किया और हिमालय में जम्मू कश्मीर व हिमाचल की तरफ चले गए. और तीसरा विघटन गुजरात में जो रेबाडी गुर्जर बचे थे ब्राह्मणवादी व सामंती मानसिकता के गुर्जरों ने उन्हें जोड़कर चलने के बजाय गुर्जरों से अलग कहना शुरू कर दिया. गुजरात में इन रेबाडी गुर्जरों की भारी जनसँख्या है व गुर्जर खून होने के कारण विद्रोही स्वभाव इनकी पहचान है. जंहा आम गुजराती छोटे कद व कम लम्बाई के लिए बदनाम हैं वंही सुन्दर नैन नक्श व हट्टे कट्टे रेबाडी प्रथम दृष्टया गुर्जर लगते हैं व अलग ही पहचाने जाते हैं. खटाना, सोलंकी, हूण, परमार, चौहान, भाटी, पंवार आदि इनके मुख्य गोत्र हैं. रेबाडीयो के सुन्दर नाक नक्श होने की वजह से सर हर्बर्ट रिजले सहित कई नस्ल विज्ञानियों ने इन्हें विशुद्ध गुर्जर माना है.
मुग़ल काल में जैसा व्यवहार राजपूत बन गए गुर्जरों ने आम गुर्जरों के साथ किया वैसा की व्यवहार ब्राह्मणवादी मानसिकता के गुर्जर आज रेबाडी गुर्जरों के साथ कर रहे हैं. एक तरफ हमारे गुर्जर संगठन सरदार पटेल का राग अलापते नहीं थकते, मान लिया कि वो गुर्जर थे लेकिन क्या फायदा जब उनके वंशज आज खुद को गुर्जर नहीं मानते? खुद सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल कनबी महासभा की अध्यक्ष रही हैं. दुसरे लेवा पटेल समुदाय को आज गुर्जर कहना बेमानी होगी क्योकि उनकी 70% शादी ब्याह दूसरी अंतरजातीय होते हैं, शक्लो सूरत और संस्कृति के आधार पर लेवा पटेल आज एक बनिया समुदाय है. अगर आप मोटी तोंद वाले मरियल शरीर के लोगो को गुर्जर मानते हो तो बेशक मानते रहे...... वंही दूसरी तरफ रेबाडी समुदाय की तरफ कभी इन संगठनो का ध्यान नहीं जाता क्योंकि जब तक इनमे ब्राह्मणवादी मानसिकता है तब तक ये यूँ ही गुर्जर समुदाय को छलते रहेंगे. 
आज भी बहुत से रेबाडी नाम के साथ शान से गुर्जर लिखते हैं उनसे पूछो तो वो बताते हैं की हम गुर्जर ही थे और ये सरनेम हमारे पुरखो का है. लेकिन हमारे गुर्जर ठेकेदारों को ये हजम नहीं होता इन्हें तो पटेलो के ही जूते साफ़ करने में मजा आएगा. कुछ स्वयंभू नेता फेसबुक पर कहते हैं कि रेबाडियो को क्यों गुर्जर बना रहे हो वो तो अलग जाति है जो पिछड़ी हुई है जबकि अपने आस पास नहीं देखते राजस्थान में कितने % गुर्जर अभी भेड़ बकरियां चराते हैं. कुछ उल्लू कुर्मी समुदाय को गुर्जरों में मिलाने की वकालत कर रहे हैं इनका परम उदेदेश्य इन काले पीले लोगो को गुर्जरों में मिलकर अपनी नस्ल ख़राब करना है कुर्मी मूलतः पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड की एक जाति है जिसका गुर्जरों से कोई सम्बन्ध नहीं उनके गोत्र भी पूर्णतया भिन्न हैं. आज गुजरात में रेबाडी गुर्जर एक संगठित और शक्तिशाली समुदाय का रूप ले चूका है कुछ समय पहले रेबाडी और राजपूत समुदाय की वर्चस्व की लडाई पर आधारित एक फिल्म 'रामलीला' भी आई थी. गुजरात में रेबाडी समुदाय से कई विधायक, सांसद व मंत्री हैं, गुजरात के अलावा रेबाडी राजस्थान, हरयाणा, पंजाब व मध्यप्रदेश में अच्छी संख्या में हैं, आज जरुरत है बकरवाल, रेबाडी जैसे व्यव्सयात्मक शब्दों को हटाकर सम्पूर्ण गुर्जर समुदाय एक 'गुर्जर' झंडे के नीचे आये और सड चुकी सामन्ती प्रथाओ को तोड़कर आपस में शादी ब्याह शुरू हो फिर हमे किसी कुनबी, कुर्मी, पटेल बनिए की जरुरत नहीं.🙏🙏🙏 आपका सेवक -निशांत खटाना🙏🙏...#Gurjaratra  #Mihirbhoj #Gujarat #Gurjarpratihar  #Pratihar #Nagbhatt #GreatkingofIndia  #Chouhan_vansh #harischdra_pratihar #VeerGurjar.*#Chalukyas 
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