वाराह अवतार को उपनिषदो में चिन्हित
वाराह अवतार को उपनिषदो में चिन्हित किया जाता हैं, लेकिन इसे मुख्य रूप से हूणों और गुर्जरों से जोड़ा जाना चाहिए| यधपि वाराह अवतार पहले से ज्ञात था, परन्तु सम्भावना हैं कि यह किसी विदेशी कबीलाई पंथ के स्थानपन्न के रूप में लोकप्रिय हुआ होगा| यही कारण हैं कि उत्तर भारत में वाराह अवतार की अधिकतर मूर्तिया 500-900 ई. के मध्य की हैं, जोकि हूण-गुर्जरों का काल हैं| हूणों का नेता तोरमाण वाराह अवतार का भक्त था और गुर्जर सम्राट मिहिरभोज भी वाराह उपासक था| अधिकतर वाराह मूर्तिया, विशेषकर वो जोकि विशुद्ध वाराह जानवर जैसी हैं, गुर्जर-प्रतिहारो के काल की हैं| तोरमाण हूण द्वारा एरण में स्थापित वाराह मूर्ति भी विशुद्ध जानवर जैसी हैं| 1000 ई. के बाद की वाराह मूर्तिया तो इक्की-दुक्की ही मिलती हैं| इसी समय ‘सूर्य’ देवता का भी लोकप्रिय चलन हुआ, जोकि इसी (वाराह की) तरह विदेशी ‘मिहिर’ देवता का अनुकूलन था|यहाँ तक कि हूणों को ‘मिहिर’ भी कहा जाता था| हूणों के प्रसिद्ध नेता मिहिरकुल के एक सिक्के पर उसका नाम सिर्फ ‘मिहिर’ अंकित हैं| हूणों ने भारत में अनेक सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया| कुछ इतिहासकारों का मानना हैं कि मुल्तान और भीनमाल के सूर्य मंदिरों का निर्माण हूणों ने बौद्ध मंदिरों को ध्वस्त कर उनके भग्नावेशो पर करवाया था| कुछ अन्य इतिहासकार इन दोनों सूर्य मंदिरों की स्थापना का श्रेय कुषाणों को देते हैं|मिहिरकुल ने ग्वालियर में किले का निर्माण कराया था और वह एक सूर्य मंदिर की स्थापना की| इस मंदिर से उसका एक अभिलेख भी मिला हैं| मिहिरकुल के सिक्को पर सासानी प्रभाव वाली ईरानी ढंग की “अग्नि वेदी सेविकाओ के साथ” और सूर्य का प्रतीक “रथ चक्र” दिखाई देते हैं, जोकि हूणों के सूर्य और अग्नि उपासक होने के प्रमाण हैं| वैसे, भारत में सासानी प्रभाव से युक्त ईरानी ढंग की वेदी वाले सिक्के सबसे पहले हारा हूणों ने चलाये थे, इन सिक्को पर “अग्नि वेदी सेविकाओ के साथ”दिखाई देती हैं|शुरुआत भारत के मालवा और ग्वालियर इलाके में लगभग उस समय हुई जब हूणों ने यहाँ प्रवेश किया| आरम्भ में हूण पश्चिमी तथा दक्षिणी राजस्थान, मालवा और ग्वालियर इलाको में शक्तिशाली हुए| यही पर हमें हूणों के प्रारभिक सिक्के और अभिलेख मिलते हैं| भारत में हूण शक्ति को स्थापित करने वाले उनके नेता तोरमाण ने इसी इलाके के एरण, जिला सागर, मध्य प्रदेश में वाराह अवतार की विशालकाय मूर्ति स्थापित कराई थी जोकि भारत में प्राप्त सबसे पहली वाराह मूर्ति हैं| तोरमाण के शासन काल के प्रथम वर्ष का अभिलेख इसी मूर्ति से मिला हैं, अभिलेख की शुरुआत वाराह अवतार की प्रार्थना से होती हैं, जोकि इस बात का सबूत हैं कि हूण और उनका नेता तोरमाण भारत प्रवेश के समय से ही वाराह के उपासक थे| पूर्व ग्वालियर रियासत स्थित उदयगिरी की गुफा में वाराह अवतार पहला चित्र मिला हैं, जोकि हूणों के आगमन के काल का ही हैं|साइबेरिया में वाराह के सिर वाले देवताओ का चलन पहले से ही था और मध्य एशियाई शक, हूण आदि कबीले इससे पहले से ही प्रभावित थे| इतिहासकार आर. गोइत्ज़ (R. Goetz) के अनुसार जिस समय भारत में वाराह देवता का आम चलन हुआ, उसी समय इरानी दुनिया, अफगानिस्तान, और सासानी साम्राज्य में भी वाराह ज़ुर्थुस्त भगवान वेरेत्रघ्न के रूप में पहली बार दिखाई देता हैं| उस समय हिंदू, बौद्ध और ईरानी, सभी को, श्वेत हूणों के साथ संघर्ष करना पड़ रहा था, इसलिए इस सम्प्रदाय का साँझा स्त्रोत हूणों के साथ खोजना ही अधिक तर्कसंगत हैं| वैष्णव, तांत्रिक बौद्ध और ज़ुर्थुस्त धर्मो में वाराह देवता का एक साथ पर होने वाला ये उभार, संभवतः, हूणों या गुर्जरों से सम्बंधित किसी कबीलाई “सौर देवता” को अपने धर्मो में अवशोषित करने के प्रयास था|गोएत्ज़, एरण स्थित वाराह मूर्ति को वाराह-मिहिर की मूर्ति बताते हैं और इसकी स्थापना का श्रेय तोरमाण हूण को देते हैं| गोएत्ज़ कहते हैं, क्योकि हूण सूर्य उपासक थे, इसलिए वाराह और मिहिर का संयोग सुझाता हैं कि वाराह उनके लिए सूर्य के किसी आयाम का प्रतिनिधित्व करता था| उनकी इस बात की पुष्टि ईरानी ग्रन्थ ‘जेंदा अवेस्ता’ के ‘मिहिर यास्त’ से होती हैं, जिसमे कहा गया हैं कि मिहिर/सूर्य जब चलता हैं तो वेरेत्रघ्न वाराह रूप में उसके साथ चलता हैं| वेरेत्रघ्न युद्ध में विजय का देवता हैं| इसके भारतीय देवता विष्णु की तरह दस अवतार हैं| दोनों का ही, एक अवतार वाराह भी हैं|हालाकि वाराह अवतार को उपनिषदो में चिन्हित किया जाता हैं, लेकिन इसे मुख्य रूप से हूणों और गुर्जरों से जोड़ा जाना चाहिए| यधपि वाराह अवतार पहले से ज्ञात था, परन्तु सम्भावना हैं कि यह किसी विदेशी कबीलाई पंथ के स्थानपन्न के रूप में लोकप्रिय हुआ होगा| यही कारण हैं कि उत्तर भारत में वाराह अवतार की अधिकतर मूर्तिया 500-900 ई. के मध्य की हैं, जोकि हूण-गुर्जरों का काल हैं| हूणों का नेता तोरमाण वाराह अवतार का भक्त था और गुर्जर सम्राट मिहिरभोज भी वाराह उपासक था| अधिकतर वाराह मूर्तिया, विशेषकर वो जोकि विशुद्ध वाराह जानवर जैसी हैं, गुर्जर-प्रतिहारो के काल की हैं| तोरमाण हूण द्वारा एरण में स्थापित वाराह मूर्ति भी विशुद्ध जानवर जैसी हैं| 1000 ई. के बाद की वाराह मूर्तिया तो इक्की-दुक्की ही मिलती हैं| इसी समय ‘सूर्य’ देवता का भी लोकप्रिय चलन हुआ, जोकि इसी (वाराह की) तरह विदेशी ‘मिहिर’ देवता का अनुकूलन था|‘विष्णु’ भी ‘वेरेत्रघ्न’ और ‘वाराह’ की तरह सूर्य/मिहिर से सम्बंधित देवता हैं, इस कारण से भी हूणों के आगमन पर विष्णु के वाराह अवतार की पूजा को बल मिला होगा| भारत और इरान की कुछ सांझी अथवा सामानांतर मिथकीय परंपरा हैं, जो दोनों देशो की विरासत हैं, वाराह अवतार की पूजा भी इनमे से एक हैं|
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