#गुर्जर_प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा #हरिश्चंद्र_प्रतिहार जी

मित्रों आज की इस पोस्ट के द्वारा हम आपको मण्डौर #गुर्जर_प्रतिहार वंश के संस्थापक राजा #हरिश्चंद्र_प्रतिहार जी के बारे में जानकारी देंगे।।

मण्डौर वर्तमान में राजस्थान के जोधपुर जिले मे है यहाँ राठौड़  के आगमन के पहले यह स्थान कभी प्रतिहार गुर्जरों के अधीन था और यह प्रतिहारों का सबसे प्राचीन राज्य भी था यही से #गुर्जर_प्रतिहार वंशजो की शाखाएँ निकलकर विस्तृत हुई जिनमे जालौर, कन्नौज, उज्जैन, ग्वालियर नागौद, अलीपुरा मुख्य रुप से है यहां आज भी प्रतिहार गुर्जर अच्छी संख्या में आबाद है। 

550 ईस्वीं के लगभग जोधपुर अंचल में गुर्जर हरिश्चन्द्र #प्रतिहार द्वारा स्थापित यहां प्रतिहारों की शाखा है। इसकी राजधानी माण्डव्यपुर थी। भीनमाल जोधपुर तथा घटियाला अभिलेखों द्वारा इस शाखा के ग्यारह शासकों की जानकारी मिली है। राजा विप्र हरिश्चंद्र वेदशास्त्र पारंगत गुर्जर प्रतिहार/परिहार वंश के गुरु अर्थात पूर्वज थे। राजशेखर महेन्द्रपाल को 'रघुकुलतिलक' और रघुग्रामणी तथा महिपाल रघुवंशमुक्तामणि जैसे विशेषण देता है। श्री ए.के. व्यास का कथन है कि "विप्र" शब्द क्षत्रिय राजाओं के लिए रीषि अर्थ में प्रयोग किया गया है। यह क्षत्रिय वर्ण का था इसी वंश का इतिहास बाद के अभिलेखों में बाउक के जोधपुर अभिलेख और ककुक्क के अभिलेखों से प्राप्त होता है। इनमें दी गई वंशावलियों में अंतिम राजाओं में अवश्य अंतर है, परंतु वंशावली समान है

राजा हरिश्चंद्र बहुत ही योग्य और वीर शासक था इसने लगभग 550 ईस्वीं के लगभग गुर्जरात्रा जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मण्डौर को अपनी राजधानी बनाया। बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार #राजा_हरिश्चंद्र ने मण्डौर नामक स्थान पर शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया।राजा हरिश्चंद्र बहुत ही योग्य और वीर शासक था इसने लगभग 550 ईस्वीं के लगभग राजस्थान जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मण्डौर को अपनी राजधानी बनाया। बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार राजा हरिश्चंद्र ने मण्डौर नामक स्थान पर शत्रुओं को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया। राजा हरिश्चंद्र की दो पत्नियां थी पहली बडी पत्नी से सहचरी देवी से चार पुत्र भोजभट्ट, कक्क, रज्जिल, दद्द उतपन्न हुए। इन क्षत्रिय कुमारों ने मण्डौर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊँचा किया। 

घटियाला अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रतिहार वंश की परंपरा तीसरे भाई रज्जिल प्रतिहार से प्रारंभ हुई। इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारम्भ "मण्डौर - मेढ़ता " से हुआ। संभवतः रज्जिल के बाद नगभट्ट प्रतिहार (600 - 625) हुआ।

नगभट्ट प्रतिहार ने मेदांतपुर को अपनी राजधानी बनाया।उसके पुत्र तट और भोज दोनो क्रमशः 675 ईस्वीं तक राज्य किया। तट के पराक्रमी पुत्र यशोवर्धन ने शालवंशी प्रथुवर्धन को पराजित किया जिससे वह पूर्व में हार गया था।।यशोवर्धन के बाद कंदुक गद्दी पर बैठा। कंदुक ने उतराधिकारी शीलुक ने भट्टी देवराज को परास्त किया। शीलुक के ही शासनकाल में अरब आक्रमणकारी जुनैद आया था। उसके पश्चात (750 - 825) ईस्वीं के मध्य क्रमशः जोट भिलदित्य और कक्क इस वंश में हुए। कक्क ने कन्नौज मालवा शाखा के शासक नागभट्ट द्वितीय के साथ मिलकर गौड़ नरेश को पराजित किया। 837 ईस्वीं के जोधपुर अभिलेख में प्रतिहार वंश से संबंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई। बाउक गुर्जर प्रतिहार के बाद उसका सौतेला भाई कक्कुक गद्दी पर बैठा। प्रतिहार गुर्जरों के उत्तर भारत में कई राज्य थे। जिनमें अलग अलग प्रतिहार नरेश शासन करत थे। लेकिन वह सभी मण्डौर से ही संबंधित थे। गुर्जर प्रतिहारों की भारत में ज्येष्ठ गद्दी एवं प्राचीन राज्य मण्डौर है। क्योंकि जितने भी प्रतिहार गुर्जर है भारत में उन सभी के पूर्वज मण्डौर के ही वंशज है। मण्डौर के बाद भारत मे प्रतिहार गुर्जरों की सबसे बडी रियासत नागौद बरमै राज्य है जो 1950 तक काबिज रही यहां आज भी 20 से 25 हजार प्रतिहार निवास करते हैं।             गुर्जर प्रतिहार वंश के महान राजा

(1) राजा हरिश्चंद्र प्रतिहार
(2) राजा नागभट्ट प्रतिहार
(3) राजा यशोवर्धन प्रतिहार
(4) राजा वत्सराज प्रतिहार
(5) राजा नागभट्ट द्वितीय प्रतिहार
(6) राजा मिहिर भोज प्रतिहार
(7) राजा महेन्द्रपाल प्रतिहार
(8) राजा महिपाल प्रतिहार
(9) राजा विनायकपाल प्रतिहार
(10) राजा महेन्द्रपाल द्वितीय प्रतिहार
(11) राजा विजयपाल प्रतिहार
(12) राजा राज्यपाल प्रतिहार
(13) राजा त्रिलोचनपाल प्रतिहार
(14) राजा यशपाल प्रतिहार
(15) राजा वीरराजदेव प्रतिहार (नागौद राज्य के संस्थापक  

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